रांची
रांची में कार्बन मार्केट पर हितधारक कार्यशाला, कार्बन वित्त से किसानों और जनजातीय समुदायों की आजीविका पर चर्चा
वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग ने रांची में कार्बन मार्केट पर हितधारक कार्यशाला आयोजित की। इसमें कृषि वानिकी, भूमि पुनर्स्थापन और ग्रामीण आजीविका के लिए कार्बन वित्त की संभावनाओं पर चर्चा हुई।

मुख्य बातें
- कार्यशाला का विषय "Leveraging Carbon Market for a Climate Resilient Jharkhand" था और यह रांची के होटल चाणक्य बी-एन-आर- में हुई।
- प्रधान मुख्य वन संरक्षक संजीव कुमार ने ISRO के आंकड़ों के हवाले से झारखंड में करीब 69 प्रतिशत भूमि क्षरण की चुनौती का जिक्र किया।
- क्लाइमेटेक्स के व्यवहार्यता अध्ययन के निष्कर्ष रखे गए और dMRV उपकरण का प्रदर्शन किया गया।
- झारखंड के लिए "Climate Hazard Mapping For Jharkhand" रिपोर्ट का विमोचन हुआ।
- तकनीकी सत्रों में CSR, प्रभाव निवेश, मिश्रित और परोपकारी वित्त के जरिये जलवायु अनुकूल परियोजनाओं के विस्तार पर चर्चा हुई।
झारखंड सरकार के वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग ने रांची के होटल चाणक्य बी-एन-आर- में "Leveraging Carbon Market for a Climate Resilient Jharkhand" विषय पर हितधारक कार्यशाला आयोजित की। कार्यशाला में कृषि वानिकी, भूमि पुनर्स्थापन और ग्रामीण विकास योजनाओं के जरिये कार्बन वित्त जुटाने और किसानों व जनजातीय समुदायों की आजीविका मजबूत करने की संभावनाओं पर चर्चा हुई।
सूचना एवं जनसंपर्क निदेशालय की विज्ञप्ति के अनुसार, कार्यक्रम में सरकारी विभागों, वित्तीय संस्थानों, जलवायु विशेषज्ञों, विकास संगठनों और निजी क्षेत्र के प्रतिनिधि शामिल हुए। इनमें नाबार्ड, बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, जी-आई-जेड- (GIZ), क्लाइमेट पॉलिसी इनिशिएटिव (CPI), झारखण्ड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी (JSLPS), प्रदान (PRADAN), सोशल अल्फा, हिंडाल्को, सिंजेंटा फाउंडेशन और एक्सीसिट-एक्सएलआरआई-नाबार्ड इन्क्यूबेशन सेंटर के प्रतिनिधि थे।

उद्योग, खनन और ऊर्जा विभागों के समन्वय पर जोर
प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख संजीव कुमार ने कार्बन ट्रेडिंग को पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय आजीविका बढ़ाने का अहम माध्यम बताया। उन्होंने उद्योग, खनन और ऊर्जा सहित सभी संबंधित विभागों के बीच समन्वय की जरूरत बताई। उन्होंने ISRO के आंकड़ों के हवाले से झारखंड में करीब 69 प्रतिशत भूमि क्षरण की चुनौती का जिक्र किया और जल संरक्षण, वृक्षारोपण, भूमि पुनर्स्थापन तथा बायोगैस जैसे उपायों को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई।
पीपीसीएफ एवं चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डन रवि रंजन ने सामुदायिक आजीविका को प्राथमिकता देने और वैज्ञानिक व प्रमाण-आधारित आंकड़ों के आधार पर कार्बन परियोजनाएं विकसित करने पर बल दिया। नाबार्ड के डीजीएम राकेश सिन्हा ने नाबार्ड की योजनाओं और वित्तीय सहयोग के जरिये किसानों और ग्रामीण समुदायों तक कार्बन वित्त पहुंचाने की संभावनाएं बताईं।
पूर्व पीसीसीएफ डॉ- एच- एस- गुप्ता ने कार्बन मार्केट को पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण आजीविका के लिए महत्वपूर्ण बताया। पीसीसीएफ (वेटलैंड) ए- टी- मिश्रा ने आर्द्रभूमि संरक्षण और जैव विविधता बढ़ाने में इसकी भूमिका रेखांकित की। क्लाइमटेक्स के निदेशक विजय ने कहा कि कार्यशाला का मकसद राज्य में जलवायु अनुकूल कृषि, कृषि वानिकी और ग्रामीण आजीविका को बढ़ावा देने के लिए कार्बन वित्त की संभावनाओं पर विचार-विमर्श करना था। कार्यक्रम में स्वागत भाषण वन प्रमंडल पदाधिकारी (DFO) अनुराधा मिश्रा ने दिया।
अध्ययन के निष्कर्ष और dMRV टूल का प्रदर्शन
कार्यशाला में क्लाइमेटेक्स (CLIMATEX) की ओर से विभाग के लिए किए गए व्यवहार्यता अध्ययन के निष्कर्ष रखे गए। उपग्रह चित्रों और वैज्ञानिक मॉडल के जरिये जैवभार और मृदा कार्बन भंडार का आकलन करने वाले डिजिटल मापन, रिपोर्टिंग एवं सत्यापन (dMRV) उपकरण का प्रदर्शन भी हुआ। इस मौके पर झारखंड के लिए "Climate Hazard Mapping For Jharkhand" रिपोर्ट का विमोचन किया गया।
तकनीकी सत्रों में सरकारी योजनाओं को कार्बन बाजार से जोड़ने, मिश्रित और परोपकारी वित्त की संभावनाओं पर चर्चा हुई। कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) और प्रभाव निवेश के जरिये जलवायु अनुकूल परियोजनाओं का विस्तार करने पर भी बात हुई।
विज्ञप्ति के अनुसार, कार्यशाला में कहा गया कि कार्बन वित्त के प्रभावी उपयोग से ग्रामीण और जनजातीय समुदायों की आय बढ़ाने, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति राज्य की अनुकूलन क्षमता मजबूत करने में मदद मिल सकती है। कार्यक्रम में वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के कई पदाधिकारी मौजूद रहे।
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